मेरे ख्याल…

मेरे ख़्यालों में इस तरह न आया करो

मुझे जाने क्या-क्या  गुमां होता है
वक्त -बेवक़्त का ख़्याल किसे है
तुमसे न मिलूँ तो ,दिल बड़ा उदास रहता है
भरा है दिल ,पुरनम हैं आँखें
इस तरह तसल्ली न दे मुझे

वो हौसला मैं लाऊँ कहाँ से

तेरी यादें जो भुला दूँ दिल से
हश्र की रात है और तुम्हारे जाने का वक्त भी
दिल से लहू जैसे कोई निचोड़े लिऐ जाता है।।

सौगात…

मैं जानता हूँ वस्ल की रात लम्बी न होगी

तुम चल दोगे मुझे हिज्र की सौगात देकर

चश्मे-पुर आब हो तो क्या,

होश में न हम हो तो क्या

मेरा अहद है तेरी राहों को

अपने दिल के लहू से सजाऊंगा मैं

बहुत फख्र था अपनी मुहब्बत पे हमें

ये न जाना था, जिसे दिलोजान से चाहा

उसे ही न पाऊँगा ,मैं।

 

इक मंजर…

इन लम्हों में कुछ न सोचो

तपती हुई राहें हैं, और तन्हा से हम-तुम

अल्फा़ज़ महके हुए,कुछ बहके हुए हम-तुम

झिलमिलाते हैं आँखों में रुके हुए आँसूं

इस मिलने बिछड़ने के मंजर से जरा निकलें

अब के बिछड़े तो शायद फिर न मिले हम-तुम

कसक…

वो एक पल मेरा ख्व़ाब था

या मेरी आँखों में ख़ुमार था
क्यों दिल मेंं मेरे कसक सी थी
क्यों आँखों में गर्द-ओ-गुबार था

न मलाल कर ये ख़ता है तेरी

इक ख़्वाब था जो बिखर गया
वो अश्क था तेरी आँख का
तेरी आँख से जो उतर गया

न लौट कर अब आयेगा 
वो गुजर  गया तो गुजर गया ।

कब मिले थे मुझे ये ख़्याल नहीं
मेरी रूह को छूके कोई गुजर गया ।

नामुराद…

रातें तो खैर ख्व़ाबों में गुज़र जाती हैं

वर्ना दिल तो अक्सर उदास रहता है
तारीकियों में भी जो मेरे साथ रहा है

वो गुमशुदा जाने रहता कहाँ है 
दूरियों में करीबी का अहसास तो है

वो मेरे पास नहीं है फिर भी मेरे पास तो है

भूलने की दुआ करूँ मैं उस नामुराद को

जिसने  मेरे दिल को बरबाद कर दिया ।

दुआ…

तुम्हारी आवाज़ है और मेरे ख़्याल हैं

वो भी सुनता है दिल जो तुमने कहा नहीं होता
मैं सज़दे में था उठे भी थे हाथ दुआ के लिए
मांग लेता ख़ुदा से कुछ भी,गर तू पहलू में मेरे नहीं होता

शबे-इन्तजार…

कभी तो वो भी बहाने से मुझसे मिलने आऐ

मैं भी जानूं, उसे मुझसे है मुहब्बत कितनी
सर्द चाँदनी रातों मे वो मेरा इन्तज़ार करे

और जाने, शबे-इन्तज़ार है कयामत कितनी

क्या करूँ…

आते हैं सितम याद तो जी करता है छोड़ दूं
मुड़-मुड़ के तकता है उसी को,इस दिल का क्या करूँ
दिल के हाथों कोई इतना भी मज़बूर न हो
सहता रहूँ सितम ,और गिला न करूँ
मैं तो वो राह छोड़ दूं जिधर उसका घर है
वो दिल की राह से गुज़रता है, क्या करूँ।
बेईमा ने इस दिल में कुछ ऐसे घर किया है

जु़दाई में उसकी पशेमां हूँ, क्या करूँ।

हाल-ए-दिल…

लाख किया ज़ब्त दिल पर मैंने

नज़रों से पढ़ लिया,उन्होंने हाल-ए-दिल मेरा

मुस्कुरा के देखा उन्होंने इस तरह
जा़हिर हो गया सब अहवाल मेरा